Sunday, May 27, 2018

सम्बन्ध


जब मैंने पत्नी के बारे में सोंचा
तो मेरी माँ याद आई
असीम स्नेह और अपरमित दुलार युक्त
चेहरे के साथ
मैं जिज्ञासु हो उठा !
मैंने अपनी बेटी को याद किया
बरबस मेरी आंखों के सामने थे 
मेरी बहनों के मुख
नटखट शैतान और हठीले 
 परन्तु परवाह से भरे
मैं अवाक था...!!
मैंने ख़ुद के विषय में सोचा
मैंने महसूस किया मजबूत कंधों ,
चौड़ी छाती
और विशाल बाजुओं को
जो तत्पर थे मेरा कहना मानने के लिए
ये मेरे भाई है
मेरा मन गदगद हो उठा !!
मैंने सोचा पुत्र क्या है
जो अपनी ही धुन में रहता है
धौंस जमता और रोब झाड़ता है हर समय
मेरे सम्मुख था मेरे पिता का सम्पूर्ण वांग्मय
 वे ना जाने कहाँ व्यस्त रहते
परन्तु आवश्यकता पड़ने पर रेगिस्तान से भी जल खींच लाते।
मैं और भी आशान्वित हो गया।

                                - योगेन्द्र पाण्डेय

Friday, July 24, 2015

माँ


माँ कितनी सरल है,
माँ कितनी तरल है,
माँ के जितना सहना,
फिर भी कुछ ना कहना,
माँ के विषय में उतना ही,
कठिन है कुछ कहना  ।
माँ जीवन है अभिमान है,
माँ मानवता का स्वाभिमान है।
माँ जीवन  का राग और ताल है,
माँ मेरे झूँठों की मजबूत ढाल है।
माँ जीवन की साज और सज्जा है,
माँ रक्त है प्राण है अस्थि मज्जा है।
माँ स्नेह की सरिता और प्रेम की मूर्ति है,
माँ निःशर्त निःस्वार्थ लालित्य की पूर्ति है।
माँ सृष्टि है सत्य की नियामक है ,
माँ की शक्ति सारे जहाँ  में व्यापक है।
माँ ममत्व की एकमात्र प्रखर प्रवक्ता है ,
माँ मेरे बचपन की  कुशल अधिवक्ता है।
माँ  गलतियों का नितांत माफ़ी नामा है,
माँ अनंत प्रेम का अनवरत हलफनामा है।
माँ अपनेपन की अनोखी हिरासत है,
माँ जीवन की सबसे बड़ी विरासत है।
माँ पृथ्वी से बड़ी है  -सुना है,
माँ की गोद कितनी बढ़ी है -गुना है।
हम कुछ भी हो जाये,
चाहें हम बहुत बड़े हो जाएँ,
हम जीवित ही भगवान हो जाएँ,
लेकिन...
माँ के आगे सब बौने है,
दुधमुहे छौने हैं।
माँ है तो क्या गम है,
माँ है तो हम है
नहीं तो बहुत कम हैं।

- योगेन्द्र पाण्डेय
   शिक्षक एवं प्रशिक्षक
    553/3
    विजय लक्ष्मी नगर
     सीतापुर

ज़िन्दगी


जिन्दगी स्वर्ग है
जो प्रेम में निबद्ध है
जिन्दगी नर्क है
जो प्रतिशोध से सम्बद्ध है।
जिन्दगी एहसास है
जो रूमानी हुआ
जिंदगी व्याख्या है
जो कहानी हुआ ।
जिन्दगी ठहर गयी
जो झील हुआ
जिन्दगी चल पड़ी
जो मील हुआ ।
सतत परिवर्तन है
जिंदगी नर्तन है ।
जिन्दगी थक गयी
जिसने हार मान ली
जिन्दगी जिन्दा है
जिसने रार ठान ली।
जिन्दगी झरना है
जिसने बहना सीखा
जिन्दगी पड़ाव  है
जिसने ठहरना सीखा ।
जिन्दगी दर्शन है
जो द्रष्टा है
जिन्दगी ब्रह्म है
जो स्रष्टा है ।
जिन्दगी होश है
जो जागा
जिन्दगी जोश है
जो भागा ।
जिन्दगी सबकुछ है
जिन्दगी सतरंगी है
लाल हरी नीली पीली
कुछ कुछ नारंगी है ।
ना कुछ में सबकुछ
अपना ये जीवन है
छोडो सब बातें
ये आल इन वन है ।
*************
                  - योगेन्द्र
                       1:56 AM

मुक्ति


मैं बनना चाहता हूँ
कांच की गोलियाँ
रंगीन खिलौने
छोटे-छोटे धनुष और तीर
शकर के गोले
प्यारी फिरकियाँ और मूर्तियां मिट्टी की
मीठी टॉफियाँ और कम्पट
और मैं बनना चाहूँगा
पेड़ों पर लदे फल,महकते फूल
और वह सब जो बच्चों को देता है खुशी
मैं चाहूँगा नन्हें हाथों से
दुलराया और सहलाया जाना
और जी भर जाने पर
उन्हीं हाथों से तोड़ कर फेंक दिया जाना
कुछ पलों की खुशी जो मैं
दे जाऊँगा बच्चों को
मेरे होने को सार्थक कर देगी
यही भवना कि
बच्चे भगवान् का रूप होते है
मुझे मुक्त कर देगी
मुझे मुक्त कर देगी

Tuesday, June 15, 2010

कितना कठिन है

कठिन  है, कितना कठिन है !!
मौन में  अनवरत जीना,
कठिन  है कितना कठिन है
निरंतर जागते रहना
है कठिनतम
रिक्तता की गुरु शिला के तले दब कर ,
साँस को भी चूंस कर पीना
दिये की निष्कंप बाती सा निरंतर
स्वयं के धुएं  में घुटकर
शून्य में ही  सुलगते रहना |
कठिन  है, कितना कठिन है !!
शून्य के उस पयोधर तक पहुँच  पाना
और उस से सत्य की चिन्मयी रस धारा बहा देना
दूर हिम नद में छिपी ज्यों एक सलिला
और उसकी गर्भ- जल-धारा
एक  भगीरथ की तपस्या सा कठिन है
उसको धरा पर प्राण दे पाना |
वह जो अंतर की अँधेरी गुहा में
जागता रहता सदा अविकल प्रतीक्षा में
कौन है वह ....
एक हीरा तोड़ने जितना कठिन है
उस सदा गति मय उपस्थिति को
कोई अर्थ दे पाना
कोई नाम दे पाना ...

आयी किरण पाती पिया की








आयी किरण पाती पिया की,
बज उठी सांकल हिया की |


भावना ने पंख तोले
दृष्टि ने उठ द्वार खोले,
सामने देखी क्षितिज पर,
लाल पगड़ी डाकिया की |

बिछौने के शूल सारे,
खिल उठे बन फूल सारे,
रात भर की थकी हरी,
सो गयी बाती दिया की |

आस ने आँगन बुहारा
आस्था बोली दुबारा


मैं न कहती थी वो एक दिन
पीर बूझेंगे जिया की
























Friday, June 11, 2010

तुम्हारी याद





तुम्हारी याद 
दिव्य जागरण के शीतल द्वार में
प्रवेश की तरह है   ,
जैसे  ओस की बूंद फिसली हो पंखुरी  पर 
और सिहर उठा हो पुष्प 
ठीक उसी सिहरन की तरह है 
तुम्हारी याद का आना 
तुम्हारा स्मरण 
मेरे अचेतन की बांसुरी है 
और उसकी धुन 
मेरे रोम रोम में गूंजता राग भैरवी है 
मै जानता हूँ 
तुम्हारी याद एक क्रांति है 
ठीक उस छुवन की तरह 
जिसका अर्थ है पीड़ा दर पीड़ा 
पर मुझे मंजूर है
इसी तरह जीना 
और शायद  इसी तरह जीवन भर ...